प्रदेश स्तर पर 30% महिला आरक्षण के फैसले की अनदेखी, शहरी नेताओं को ग्रामीण संगठन में तरजीह देने पर भी विवाद?
जसीम कुरैशी की रिपोर्ट
छूरिया छत्तीसगढ़ में जिला कांग्रेस कमेटी की नई कार्यकारिणी के गठन के बाद संगठन के भीतर असंतोष उभरकर सामने आ रहा है।चारो विधानसभा में कोई संतुलन दिखाई नहीं पड़ती गैंदालाल कुमदा क्षेत्र को भी कोई तवज्जो या प्रतिनिधित्व नहीं जबकि एक ही ब्लाक से सर्वाधिक महत्व सूत्रों के अनुसार, नई टीम में आदिवासी वर्ग और महिला नेतृत्व को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है जबकि प्रदेश स्तर पर समावेशी नेतृत्व की बात लगातार की जाती रही है। इस मुद्दे ने न केवल संगठनात्मक संतुलन पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि स्थानीय नेताओं की कार्यशैली पर भी चर्चा तेज कर दी है।
जिला कांग्रेस कमेटी की हाल ही में घोषित नई टीम को लेकर पार्टी के भीतर ही विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। आरोप है कि संगठन के पुनर्गठन में आदिवासी वर्ग और महिला नेताओं को दरकिनार किया गया है जबकि प्रदेश स्तर पर इन्हें प्राथमिकता देने की स्पष्ट नीति अपनाई गई थी। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व वर्तमान में आदिवासी समाज से आने वाले नेता के हाथों में होने के बावजूद, राजनांदगांव जिले में आदिवासी समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह निर्णय पार्टी की जमीनी हकीकत और सामाजिक संतुलन के विपरीत है। महिला नेतृत्व को लेकर भी स्थिति संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। प्रदेश नेतृत्व द्वारा संगठन में 30 प्रतिशत पद महिलाओं को देने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था लेकिन जिला स्तर पर इसे नजरअंदाज करते हुए महज करीब 10 प्रतिशत महिलाओं को ही जगह दी गई है। इससे महिला कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है और इसे संगठन की प्रतिबद्धता पर सवाल के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा नई टीम में शहरी पृष्ठभूमि के नेताओं को ग्रामीण कांग्रेस इकाइयों में स्थान दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मानना है कि इससे स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी हो रही है और जमीनी मुद्दों की समझ रखने वाले कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिल पा रहा है। सूत्रों के अनुसार जिला अध्यक्ष द्वारा टीम चयन में एकतरफा निर्णय लेने के आरोप भी सामने आए हैं। कई ऐसे चेहरों को संगठन में शामिल किया गया है जिन्हें पहले से ही विवादित माना जाता रहा है। इससे संगठन की छवि और कार्यप्रणाली दोनों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अब देखना यह होगा कि इन आरोपों और असंतोष के बीच प्रदेश नेतृत्व इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या संगठन में संतुलन व समावेशिता बनाए रखने के लिए कोई
सुधारात्मक कदम उठाए जाते
हैं। जबकि अखिल भारतीय कांग्रेस सम्मेलन में निर्देशित किया गया था की एसटी एससी-ओबीसी यूवाओ की 50% सहभागिता संगठन व टिकट पर सुनिश्चित करने की जिसे भी नजरअंदाज किया गया जिला ग्रामीण अध्यक्ष के कार्यकारिणी में जमीनी हकीकत से कोसों दूर है पार्टी निर्देश का भी कोई असर नहीं पार्टी हित के विपरित कार्य कहां जा सकता है
