जसीम कुरैशी की रिपोर्ट
छुरिया/ छत्तीसगढ़ में जहां एक ओर भाजपा सरकार “सुशासन त्योहार 2026” के भव्य आयोजनों में जुटी है, वहीं राजनांदगांव जिले से एक ऐसी राजनैतिक सुगबुगाहट सामने आई है जिसने सत्ताधारी दल के ‘विकास’ के दावों को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। कांग्रेस के कद्दावर नेता चुम्मन साहू ने जिला प्रशासन और भाजपा के जनप्रतिनिधियों पर सीधा प्रहार करते हुए पूछा है— “जब मुखिया के आंगन में ही अंधेरा है, तो पूरे जिले में उजाले का भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है?”
भंडारपुर की बदहाली: सुशासन या सिर्फ विज्ञापन?
विवाद का केंद्र बना है भंडारपुर, वह गांव जो भाजपा समर्थित जिला पंचायत अध्यक्ष का गृह ग्राम है। प्रशासन ने इसी गांव से “जन समस्या निवारण समाधान शिविर” की शुरुआत कर इसे ‘आदर्श’ पेश करने की कोशिश की थी। लेकिन चुम्मन साहू ने जमीनी हकीकत की परतें उधेड़ते हुए कहा कि भंडारपुर आज सरकारी उपेक्षा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
साहू ने तीखे लहजे में कहा, “यह विडंबना ही है कि जिस गांव को जिले का गौरव होना चाहिए था, वहां ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। यदि जिला पंचायत अध्यक्ष अपने ही गांव की तस्वीर नहीं बदल पा रहे, तो पूरे जिले के लिए उनकी दृष्टि और सरकार का सुशासन केवल कागजी और मंचीय भाषणों तक सीमित है।”
आरोपों की झड़ी: तीन बड़े सवाल, जो जवाब मांगते हैं
चुम्मन साहू ने भंडारपुर के दौरे के बाद तीन प्रमुख मुद्दों पर सरकार और प्रशासन को घेरा है:
- अधूरी पानी टंकी (प्यास का इंतज़ार): गांव में पानी टंकी का निर्माण सालों से अधूरा पड़ा है। “हर घर जल” का नारा यहां दम तोड़ता नजर आ रहा है। साहू ने पूछा कि आखिर कब तक ग्रामीणों को पेयजल के लिए मीलों भटकना होगा?
- सूखा तालाब (जल संरक्षण की विफलता): जल संरक्षण के बड़े-बड़े दावों के बीच भंडारपुर का मुख्य तालाब सूख चुका है। न तो उसका गहरीकरण हुआ और न ही जीर्णोद्धार।
- बदहाल गौशाला (पशु संरक्षण का दिखावा): राज्य सरकार की पशु संरक्षण योजनाओं को आईना दिखाते हुए भंडारपुर की गौशाला बदहाली की स्थिति में है। वहां न तो मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा है और न ही रहने की समुचित व्यवस्था।
झिथरा टोला में पुल पिछले साल पहली बारिश में बह गया था जिसकी सुध शासन प्रशासन द्वारा नहीं लिया गया
“त्योहार” नहीं, “समाधान” चाहिए
चुम्मन साहू ने “सुशासन त्योहार” के आयोजन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जनता को टेंट, लाउडस्पीकर और लच्छेदार भाषणों वाले आयोजनों की नहीं, बल्कि ठोस काम की जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार समाधान शिविरों के नाम पर केवल जनता की आंखों में धूल झोंक रही है और एक ‘पॉजिटिव इमेज’ बनाने की नाकाम कोशिश कर रही है।
