भगवान बिरसा मुंडा केवल एक योद्धा ही नही, बल्कि वे आदिवासी समाज की आत्मा और पहचान थे : ललित चंद्राकर


(जसीम कुरैशी की रिपोर्ट)
छुरिया : छुरिया विकासखंड के महाराष्ट्र सीमा से लगे ग्राम केशोखैरी में ध्रुव गोंड आदिवासी समाज द्वारा भगवान बिरसा मुंडा जी की प्रतिमा स्थापित किया है,जिसका अनावरण अवसर के मुख्यातिथि ललित चंद्राकर उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण एवं अन्य क्षेत्र पिछड़ा वर्ग विकास प्राधिकरण व एम.डी. ठाकुर प्रदेश उपाध्यक्ष अनु. जन.जाति मोर्चा,संजय पुराम विधायक, आमगांव (महाराष्ट्र),किरण वैष्णव अध्यक्ष जिला पंचायत,संजय कुमार सिन्हा अध्यक्ष जनपद पंचायत छुरिया मुख्य रूप से उपस्थित रहे। सभी अतिथियों ने आदिवासी समाज के ईष्ट देवी देवताओं के पूजा अर्चना पश्चात भगवान बिरसा मुंडा मूर्ति का अनावरण किया गया । कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा भारत के महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और जननायक थे। उन्होंने अंग्रेजों और जमींदारों के अत्याचार के खिलाफ आदिवासी समाज को एकजुट कर संघर्ष किया। ठाकुर ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा जी जन्म और प्रारंभिक जीवन जन्म 15 नवम्बर 1875 को उलिहातू गाँव, झारखंड में हुआ,मुंडा जनजाति से आते थे, उनका बचपन से ही वे तेजस्वी, साहसी और न्यायप्रिय थे। पुराम ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि बिरसा मुंडा जी कुछ समय तक मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की, जिससे उन्हें समाज की स्थिति को समझने में मदद मिली। सामाजिक और धार्मिक सुधार बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को अपनी संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान बचाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने नशा, अंधविश्वास और कुरीतियों का विरोध किया। लोगों को शिक्षा, स्वच्छता और एकता का संदेश दिया।आदिवासी समाज में उन्हें “धरती आबा” कहा जाने लगा। उलगुलान आंदोलन (महान विद्रोह) सन् 1899–1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान (महाविद्रोह) हुआ। अंग्रेजी शासन का विरोध,
जमींदारों के शोषण से मुक्ति आदिवासियों की जमीन वापस दिलाना इनका मुख्य उद्देश्य था । यह आंदोलन झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में फैला। गिरफ्तारी और बलिदान अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनकी मृत्यु: 9 जून 1900 (रांची जेल में) उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी। उनका बलिदान आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देता है। उनका उद्देश्य आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाई भूमि और जंगल पर आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया
आदिवासी चेतना को नई दिशा दी
इसी कारण 15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। कई संस्थान, पार्क और स्मारक उनके नाम पर हैं। वे आज भी “आदिवासी वीर” के रूप में पूजे जाते हैं। इस अवसर पर सुरेंदर सिंह भाटिया,खिलेश्वर साहू, कामता साहू,अनिता मंडावी जिला पंचायत सदस्य,बीरम मंडावी, प्रशांत ठाकुर उपाध्यक्ष जनपद पंचायत, उभेराम मंडावी,स्वाति मंडावी सरपंच, रामकुमार मंडावी,हनीफ कुरैशी सहित बड़ी संख्या में आदिवासी समाज सहित ग्रामीणजन मौजूद रहे।

Author: Sudha Bag

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