सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार
छुरिया क्षेत्र के जंगलों में तेंदुए की सक्रियता ने पूरे ग्रामीण अंचल में भय और दहशत का माहौल बना दिया है। जंगल से सटे गांवों में लोग सहमे हुए हैं, वहीं शाम ढलते ही आवाजाही लगभग ठप हो जाती है। लगातार सामने आ रही घटनाएँ इस ओर इशारा कर रही हैं कि वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था गंभीर रूप से कमजोर पड़ चुकी है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वनों की अंधाधुंध कटाई, निर्माण कार्यों की भरमार और कमजोर मॉनिटरिंग के चलते जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। जंगलों में रहने वाले जानवर अब भोजन, पानी और सुरक्षित आवास के अभाव में गांवों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
योजनाएँ कागज़ों में, जमीनी हकीकत गायब
केंद्रीय एवं राज्य पोषित योजनाओं के तहत जंगलों में कई कार्य दर्शाए जाते हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता और वास्तविक स्थिति जानने की जहमत न तो विभाग उठाता है और न ही जनप्रतिनिधि।
कौन सा कार्य कहाँ हुआ, किस योजना में कितना खर्च हुआ — इसकी जानकारी कहीं सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं होती। अधिकांश कार्य गुमनामी के अंधेरे में निपटा दिए जाते हैं, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या डीएफओ अपने दायित्व निभा रहे हैं?
डीएफओ (वन मंडल अधिकारी) का मूल दायित्व जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण है। इसके अंतर्गत वन विभाग को:
एंटी-पोचिंग कैंप स्थापित करना
कैमरा ट्रैप, ड्रोन व जीपीएस मॉनिटरिंग करना
अवैध शिकार पर वन अपराध प्रकरण दर्ज करना
बीमार व घायल वन्यजीवों का उपचार
रेस्क्यू ऑपरेशन (कुएँ, बस्ती या सड़क पर भटके जानवरों का)
आवश्यकता पड़ने पर जंगल में ही इलाज या रेस्क्यू सेंटर भेजना
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का सख्ती से पालन
जैसी जिम्मेदारियाँ निभानी होती हैं।
परंतु आए दिन जंगली जानवरों का जंगल से बाहर आना इस बात का संकेत है कि या तो ये व्यवस्थाएँ नाकाफी हैं या सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि विभागीय जिम्मेदारियाँ अब मीटिंग, सीटिंग और ईटिंग तक सिमट कर रह गई हैं।
छुरिया के युवाओं पर तेंदुए ने किया हमले का प्रयास
बीते दिनों छुरिया क्षेत्र में एक सनसनीखेज घटना सामने आई। बताया जा रहा है कि कुछ युवक कार से घूमने निकले थे। रास्ते में जैसे ही वे मूत्रविसर्जन के लिए रुके, तभी तेंदुए ने अचानक हमला करने की कोशिश की।
अचानक हुए इस हमले से अफरा-तफरी मच गई। युवक दौड़कर छिपे और जान बचाने की कोशिश की। इस दौरान एक व्यक्ति के घायल होने की भी सूचना है।
ग्रामीणों में आक्रोश, ठोस कार्रवाई की मांग
घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते वन्यजीवों के लिए पानी, भोजन, सुरक्षा और आवास की समुचित व्यवस्था की जाती, तो आज हालात इतने भयावह नहीं होते।
अब सवाल यह है कि —
क्या किसी बड़ी जनहानि के बाद ही वन विभाग जागेगा?
या फिर तेंदुए की यह दहशत यूँ ही प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती रहेगी?
ग्रामीणों ने मांग की है कि क्षेत्र में तत्काल निगरानी बढ़ाई जाए, रेस्क्यू टीम तैनात हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि मानव–वन्यजीव संघर्ष को समय रहते रोका जा सके।
