तहसीलदार की भूमिका पर उठ रहे सवाल?
&जसीम कूरैशी कि रिपोर्ट &
छूरिया सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार क्षेत्र में अवैध निर्माण की खुली छूट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां जंगल ज़प्त जमीन पर बिना किसी अनुमति और बिना एनओसी के धड़ल्ले से शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़े कर दिए गए हैं। ये ज़मीनें मूलतः निवास के लिए पट्टे पर दी गई थीं, मगर नियमों को दरकिनार करते हुए इनका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सारा खेल तहसील कार्यालय की नाक के नीचे और तहसीलदार की जानकारी में हो रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि तहसीलदार की मौन स्वीकृति और कार्यालय की मिलीभगत के बिना ऐसा संभव ही नहीं है। जिस ज़मीन का स्वरूप आवासीय है, उस पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनने का सीधा मतलब है कि राजस्व विभाग और तहसील प्रशासन ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि या तो तहसीलदार जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं, या फिर पूरे मामले में उनकी भूमिका संदिग्ध है। छूरिया और आसपास के इलाकों में इस अवैध निर्माण को लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। कई ग्रामीणों ने बताया कि जब भी किसी साधारण किसान या गरीब व्यक्ति द्वारा ज़मीन का मामूली उल्लंघन किया जाता है, तो तहसील कार्यालय तत्काल नोटिस थमा देता है। लेकिन बड़े-बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने वालों पर कोई रोक-टोक नहीं होती। इससे लोगों में गुस्सा और आक्रोश है। जंगल जप्त जमीन पट्टा पर इस तरह के अवैध निर्माण न सिर्फ राजस्व कानूनों की अवहेलना है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वन अधिनियम का भी उल्लंघन है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गड़बड़ियां न केवल अवैध कब्ज़े को बढ़ावा देती हैं, बल्कि सरकारी भूमि पर भूमाफियाओं के हौसले भी बुलंद करती हैं।
लोगों का कहना है कि प्रशासन की खामोशी अपने आप में बड़ा सवाल है। यदि तहसीलदार और उनका स्टाफ चाहे तो एक आदेश में अवैध निर्माण रुक सकता है और दोषियों पर कार्रवाई हो सकती है। मगर महीनों से चल रहे इस खेल पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यही वजह है कि अब सीधे-सीधे तहसीलदार की भूमिका पर उंगलियां उठ रही हैं।ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। उनका कहना है कि यदि अभी सख्ती नहीं की गई तो आने वाले दिनों में छूरिया क्षेत्र में अवैध शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का जाल बिछ जाएगा और सरकारी जमीन हमेशा के लिए निजी हाथों में चली जाएगी।
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