जसीम कुरैशी की विशेष रिपोर्ट
छुरिया राजनांदगांव जिले की छुरिया नगर पंचायत इस समय राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुकी है, जहां जनता के बुनियादी मुद्दे हाशिए पर हैं और नेता अपनी पद प्रतिष्ठा बचाने के गुणा-भाग में व्यस्त हैं। शहर की बदहाल जर्जर सड़कें, पानी का संकट और ठप पड़ा विकास कार्य चीख-चीखकर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछ रहा है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि स्थानीय मुद्दों पर आक्रामक रहने वाला विपक्ष इस समय रहस्यमयी रूप से पूरी तरह ‘मौन’ बैठा है।भीतरघात और निष्कासन ने तोड़ी विपक्ष की रीढ़ छुरिया की राजनीति में आए इस सन्नाटे की जड़ें पिछले कुछ वर्षों में हुए बड़े सियासी उलटफेर से जुड़ी हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा अनुशासनहीनता के आरोप में अपने ही 8 पार्षदों को 6 साल के लिए निष्कासित करने और फिर अवसर प्राप्ती पर वापसी के फैसले ने विपक्ष के संगठनात्मक ढांचे को हिलाकर रख दिया। इसके बाद नगर पंचायत के उपाध्यक्ष सलमान खान का भाजपा से इस्तीफा और पाला-बदल ने विपक्ष के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया। प्रमुख स्थानीय चेहरों के बिखरने से विपक्ष के पास अब न तो नगर पंचायत के सदन में वैसी ताकत बची है और न ही सड़कों पर आंदोलन करने का दम।अविश्वास प्रस्ताव के परदे के पीछे का खुला खेल छुरिया नगर पंचायत में सत्ता और विपक्ष का अंतर तब खत्म हो गया जब तत्कालीन अध्यक्ष राजकुमारी सिन्हा के खिलाफ खुद उनकी ही पार्टी (कांग्रेस) के पार्षदों ने मोर्चा खोलते हुए अविश्वास प्रस्ताव पास करा दिया। इस सियासी खेल में परदे के पीछे हुए समझौतों ने पारंपरिक ‘पक्ष-विपक्ष’ की मर्यादा को मिटा दिया। जानकारों का कहना है कि जब दोनों पक्षों के कद्दावर? नेता आंतरिक लाभ और समीकरणों को साधने के लिए एक ही नाव पर सवार हो गए, तो जनता की आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचा।आगामी चुनाव और नेताओं की ‘रणनीतिक चुप्पी’सूत्रों की मानें तो छुरिया में इस समय विपक्ष का मौन कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि आगामी नगरीय निकाय चुनावों को लेकर एक सोची-समझी ‘रणनीतिक चुप्पी’ है। नए वार्ड आरक्षण और टिकट की दावेदारी को लेकर नेता इस समय सीधे टकराव से बच रहे हैं। वे जनता की समस्याओं पर आंदोलन करने के बजाय अंदरूनी तौर पर वोट बैंक मजबूत करने और नई गोटियां फिट करने में व्यस्त हैं।जनता पूछ रही सवाल-? ‘हमारा रक्षक कौन?’नेताओं की इस नूराकुश्ती और विपक्ष की निष्क्रियता से छुरिया की आम जनता ठगा हुआ महसूस कर रही है। बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता आज अपने निजी स्वार्थ के लिए मौन व्रत धारण किए बैठे हैं। यदि विपक्ष भी सत्ता की हां में हां मिलाने लगे या शांत बैठ जाए, तो जनता अपनी गुहार लेकर कहां जाए?छुरिया की इस ‘मौन राजनीति’ का ऊंट आने वाले चुनावों में किस करवट बैठेगा, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन फिलहाल तो यहाँ विकास पूरी तरह वेंटिलेटर पर है?,
