“क्या योजनाएं सिर्फ कागज और कंक्रीट के ढांचे तक सीमित हैं? जब जनता प्यासी है, तो करोड़ों की टंकियों का क्या मोल?” –चुम्मन साहू


(जसीम कुरैशी की रिपोर्ट)
छूरिया कांग्रेस नेता चुम्मन साहू के इसी सवाल ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी।

एक्शन में प्रशासन: कहाँ-कहाँ शुरू हुआ काम?
प्रशासन ने अब अपनी कमियों को ढंकने और जनता को राहत देने के लिए युद्धस्तर पर काम शुरू किया है:

  • बोर खनन की शुरुआत: जिन टंकियों में पानी नहीं चढ़ पा रहा था, वहां अब नए बोर खनन का कार्य शुरू किया गया है ताकि सोर्स को मजबूत किया जा सके।
  • इन गांवों में राहत की उम्मीद:
  • कल्लूटोला व बनिया टोला: यहां नए हैंडपंपों का खनन कर फौरी राहत दी जा रही है।
  • भंडारपुर व बिसाहू टोला: लंबे समय से पेयजल संकट से जूझ रहे इन गांवों में मशीनें पहुंच चुकी हैं।
  • जल जीवन मिशन की समीक्षा: अधूरे पड़े पाइपलाइन विस्तार और कनेक्शनों की अब नए सिरे से मॉनिटरिंग की जा रही है।
    विफलता या लापरवाही? ग्रामीणों के तीखे सवाल
    क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन तभी क्यों जागता है जब कोई बड़ा नेता बयान देता है?
  1. शिकायतों की अनदेखी: ग्रामीणों ने दर्जनों बार शिकायतें की थीं, जिन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
  2. अधूरा काम: कई जगहों पर पाइप तो बिछा दिए गए, लेकिन नलों में आज तक पानी नहीं पहुंचा।
  3. स्थायी समाधान की मांग: ग्रामीण अब केवल हैंडपंप नहीं, बल्कि टंकियों के माध्यम से घर-घर शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था चाहते हैं।
    कथनी और करनी का अंतर
    चुम्मन साहू के बयानों ने यह साबित कर दिया है कि यदि विपक्ष मजबूती से जनता की आवाज उठाए, तो सत्ता और प्रशासन को झुकना ही पड़ता है। हालांकि, सवाल अब भी बरकरार है— क्या यह सक्रियता केवल बयानबाजी के असर तक सीमित रहेगी या छुरिया की माताओं-बहनों को हमेशा के लिए मीलों दूर से पानी लाने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी?

Author: Sudha Bag

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