“बिंदिया” में मानसिक स्वास्थ्य की बात: सशक्त महिला, स्वस्थ मन

रायपुर(Raipur) आज आकाशवाणी रायपुर द्वारा प्रसारित महिला केंद्रित कार्यक्रम ‘बिंदिया’ के अंतर्गत मानसिक स्वास्थ्य और महिला में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

इस विशेष कार्यक्रम में भेंटकर्ता के रूप में मोनिका शर्मा के साथ सार्थक संवाद हुआजिसके अंश आप सबकी जानकारी के लिए में साझा कर रही हूँ ।

नमस्ते सखी! एक डॉक्टर और आपकी साथी होने के नाते, मैं आपके इन सभी महत्वपूर्ण सवालों के जवाब बहुत ही सरल भाषा में देने की कोशिश करूँगी।

1. मानसिक स्वास्थ्य क्या है और महिलाओं में यह अनदेखा क्यों रह जाता है?मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ सिर्फ ‘पागलपन न होना’ नहीं है, बल्कि इसका मतलब है मन की वह स्थिति जिसमें आप खुश महसूस करें, तनाव का सामना कर सकें और अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग कर सकें। महिलाओं के मामले में यह अक्सर इसलिए अनदेखा रह जाता है क्योंकि समाज में महिलाओं को ‘त्याग की मूरत’ माना जाता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सबकी देखभाल करें, भले ही वे खुद अंदर से टूट रही हों। उनकी तकलीफ को अक्सर ‘स्वभाव’ या ‘हार्मोनल बदलाव’ कहकर टाल दिया जाता है।

2. कई भूमिकाओं का दबाव और असरघर, करियर और रिश्तों को एक साथ संभालने की कोशिश में महिलाएँ ‘सुपरवुमन’ बनने के चक्कर में खुद को भूल जाती हैं। इस निरंतर दबाव से क्रोनिक स्ट्रेस (लगातार तनाव), चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और अंततः ‘बर्नआउट’ हो जाता है, जहाँ मन पूरी तरह थक जाता है।

3. भावनाओं को दबाने की आदतजी हाँ, भावनाओं को दबाना एक ‘टाइम बम’ की तरह है। जब हम दुख, गुस्सा या डर साझा नहीं करते, तो वह शरीर में शारीरिक दर्द (जैसे सिरदर्द, कमर दर्द) या गंभीर एंग्जायटी और डिप्रेशन के रूप में बाहर आता है।

4. थकान या मानसिक परेशानी: कैसे पहचानें?सिर्फ थकान: एक अच्छी नींद या आराम के बाद आप तरोताजा महसूस करती हैं।मानसिक परेशानी: अगर आराम करने के बाद भी मन भारी रहे, उन कामों में मन न लगे जो पहले पसंद थे, और छोटी-छोटी बातों पर रोना आए या गुस्सा आए, तो यह मानसिक परेशानी का संकेत है।

5. सोशल मीडिया का प्रभावसोशल मीडिया पर दूसरों की ‘परफेक्ट लाइफ’ देखकर महिलाएँ अपनी तुलना उनसे करने लगती हैं। यह ‘हीन भावना’ (Low self-esteem) पैदा करता है। याद रखें, जो स्क्रीन पर दिखता है, वह पूरी सच्चाई नहीं है।

6. घरेलू महिलाओं का आत्म-सम्मानसमाज और कभी-कभी परिवार भी घरेलू काम को ‘काम’ नहीं समझता। इससे महिलाओं को लगता है कि उनकी कोई वैल्यू नहीं है। यह सोच सीधे उनके आत्म-सम्मान पर चोट करती है और उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेल सकती है। घर संभालना दुनिया के सबसे कठिन और महत्वपूर्ण कामों में से एक है।

7. कामकाजी महिलाओं के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस सुझाव’ना’ कहना सीखें: हर काम आप ही करें, यह जरूरी नहीं।काम का बँटवारा: घर के कामों में परिवार की मदद लें।परफेक्शन का मोह छोड़ें: हर चीज़ हर समय परफेक्ट नहीं हो सकती, और यह ठीक है।

8. रिश्तों में तनाव और खुद को संभालनारिश्तों को सहेजते समय अपनी ‘बाउंड्री’ (सीमाएं) तय करें। अगर कोई रिश्ता आपको मानसिक रूप से तोड़ रहा है, तो चुप रहने के बजाय संवाद (Communication) करें। खुद को अकेला न करें, अपनी सखियों या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें।

9. पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression)बच्चे के जन्म के बाद उदासी महसूस करना कोई शर्म की बात नहीं है। यह शरीर में होने वाले बड़े हार्मोनल बदलावों के कारण होता है। अगर नई माँ को रोना आए, बच्चे से जुड़ाव महसूस न हो, तो उसे ‘बुरी माँ’ न समझें, उसे डॉक्टर के पास ले जाएं। यह इलाज से ठीक हो जाता है।

10. अपराध बोध (Guilt) से कैसे बाहर निकलें?अपने लिए वक्त निकालना ‘स्वार्थ’ नहीं, बल्कि ‘स्व-देखभाल’ (Self-care) है। याद रखें, एक खाली घड़े से आप किसी की प्यास नहीं बुझा सकते। खुद खुश रहेंगी, तभी परिवार को खुश रख पाएंगी।

11. डिप्रेशन या एंग्जायटी होने पर पहला कदमसबसे पहले इस बात को स्वीकार करें कि आप परेशान हैं। इसके बाद किसी भरोसेमंद दोस्त या परिवार के सदस्य को बताएं और जल्द से जल्द एक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ (Psychologist/Psychiatrist) से मिलें।

12. घर वाले लक्षणों को कैसे पहचानें?अगर महिला अचानक चुप रहने लगे।साफ-सफाई या खुद के रख-रखाव पर ध्यान देना छोड़ दे।उसे बहुत ज्यादा या बहुत कम नींद/भूख आए।वह बात-बात पर चिढ़ने लगे या निराश बातें करे।

13. परिवार और समाज की भूमिकापरिवार को चाहिए कि वह महिला के काम की सराहना करे और उसे अपनी भावनाएं व्यक्त करने का सुरक्षित माहौल दे। समाज को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी वर्जनाओं (Taboos) को खत्म करना होगा।

14. दैनिक जीवन में छोटे बदलावरोज 15-20 मिनट धूप में बैठें या टहलें।अपनी पसंद का कोई एक काम (संगीत, पेंटिंग, पढ़ाई) जरूर करें।पर्याप्त पानी पिएं और गहरी सांस लेने (Deep breathing) का अभ्यास करें।

15. सखियों के लिए 4 आसान मेंटल हेल्थ टिप्स’मी-टाइम’ (Me-time): दिन के 24 घंटों में से कम से कम 30 मिनट सिर्फ अपने लिए रखें।डिजिटल डिटॉक्स: सोने से एक घंटा पहले फोन दूर रख दें।मन की बात लिखें: अगर किसी से कह नहीं सकतीं, तो उसे एक डायरी में लिख दें।मदद मांगने में न हिचकिचाएं: मदद मांगना कमजोरी नहीं, मजबूती की निशानी है।

चुपचाप सहने वाली महिलाओं के लिए संदेश:

मेरी प्यारी सखियों, आपकी चुप्पी आपकी समस्या का समाधान नहीं है। आपका जीवन और आपकी खुशी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी आपके परिवार की। सहना बंद करें और कहना शुरू करें। आप अकेली नहीं हैं, और मदद लेना आपका अधिकार है।

धन्यवाद ,आकाशवाणी , मोनिका शर्मा ,मानसिक स्वास्थ्य,हर वक्त ज़रूरी है ,मुझे उम्मीद है इस पोस्ट को रीड करके या 27-4-26,को बिनीदिया कार्यक्रम सुन कर यह लाभ ले सकती है डॉ इला गुप्ता वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक चिकित्सक ‘स्वयं सिद्धा’ जैसे कार्यक्रम महिलाओं को अपनी पहचान स्थापित करने, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने एवं समाज में सशक्त भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करते हैं।

Author: Sudha Bag

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