छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, साहित्य छत्तीसगढ़िया अस्मिता की पहचान: डिप्टी सीएम अरुण साव

बिलासपुर: हमर पुरखा डॉ पालेश्वर प्रसाद शर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को आगे बढ़ाने का काम किया, उन्होंने पहली छत्तीसगढ़ी शब्दकोश तैयार किया और छत्तीसगढ़ी भाषा को स्थापित करने आखिरी दम तक संघर्ष किया। वहीं सुरूज बाई खांडे जी ने भरथरी गायन से छत्तीसगढ़ी को देश दुनिया तक पहुंचाया, उनके गायन शैली ने भरथरी को जन जन तक लोकप्रिय बना दिया। आज की युवा पीढ़ी को इन दोनों से प्रेरणा लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ी साहित्य को आगे बढ़ाने काम करना चाहिए। यह विचार उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने बिलासपुर के प्रार्थना सभा भवन में मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी टीम द्वारा आयोजित पुरखा के सूरत संगोष्ठी में व्यक्ति किया।

साव ने आगे कहा कि, जो समाज अपने पुरखा को भूल जाते हैं, उस समाज का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि, छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति एवं साहित्य किसी से कम नहीं है। यह बहुत समृद्ध है। लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद मातृभाषा में पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई है। इसका कारण शिक्षा नीति है। दरअसल, शिक्षा नीति में इसका उल्लेख नहीं था, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो नई शिक्षा नीति में इसका उल्लेख किया, तब मातृभाषा में पढ़ाई शुरू हुई।

उप मुख्यमंत्री साव ने कहा कि, राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद नई शिक्षा नीति को क्रमशः लागू करने का काम शुरू किया है। सरकार का फोकस है कि छत्तीसगढ़ में नई शिक्षा नीति पूरी तरह से लागू हो, निश्चित ही इसमें छत्तीसगढ़ भाषा को पर्याप्त स्थान मिलने वाला है। उन्होंने बताया कि, छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी को राज भाषा का दर्जा भाजपा सरकार ने दिया। हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे। इस नारे को हम पूरा करेंगे। संगोष्ठी में केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, वरिष्ठ विधायक धरमलाल कौशिक, कुलपति एडीएन वाजपेयी, डॉ विनय कुमार पाठक, नंदकिशोर शुक्ला, रूद्र अवस्थी, लता राठौर, लखन लाल खांडे एवं छत्तीसगढ़ी साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।

Author: Sudha Bag

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